मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

आज यहाँ आकर ऐसा लगा मानों ये अंजानों की अंजुमन थी,
या शायद इस अंजुमन में आकर सब एक-दुसरे से अंजान बने थे।
ये तो कुछ ऐसी बात हो गई कि हमें  कुछ अपनों की तलाश थी,
पर जो अपने भी यहाँ थे वे भी कुछ ना पहचानने का ढोंग किए थे।
शायद उनकी भी कुछ अपनी ही मज़बुरियाँ ही रही  थी,
जो उन्हें पहचान तक नहीं रहे थे,उनके तसव्वुर में ऐसे डूबे थे।
और पहचानने वालों को तस्लीम करने की फ़ुर्सत उन्हें कहाँ थी,
चित ही चित में तसव्वुर करके भी सुर्ख गालों पर तबस्सुम बिखरे थे।

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

क्या किसी दुकान पर संवेदनशीलता बिकती है?
अगर बिकती तो मैं ज़रूर खरीद लेती।
खरीद लेती और इस संवेदनशीलता को,
देती मैं किसी प्रयोशाला में,
और इतना ज़रूर कह देती कि ,
कुछ रसायनों से इस संवेदनशीलता की अभिक्रिया कराकर,
वैज्ञानिक तुम एक संवेदना की घुट्टी तैयार करो।
तैयार करो इस घुट्टी को बाँट देती मैं इस संवेदनशून्य जगत को।
और  शायद इस घुट्टी का कुछ असर ऐसा होता,
कि जहाँ दया,संवेदना जैसे विलुप्त भाव की वज़ह से
जग में संवेदनशून्यता का बोलबाला है,
इस घुट्टी से यह जग और जग के मानव,
फ़िर से संवेदनशील हो जाते।

मानव संवेदनशील बन जाता तब जब यह दुकान पर कहीं बिकती।
यह दुकानों पर न तो  बिकती है और संवेदना न खरीदी जा सकती।
तो क्या यह संवेदनशीलता इस 21वीं सदी में भी मात्र स्वप्न  बन कर रह जाएगी?
जहाँ इस सदी के विकसित देशों की प्रयोगशालाओं में आज तो क्लोन और स्टेम-सेल
पर भी काम करके मानव बीमारियों से बचाने की मुहिम जारी है।
सच है,सारे मुहिम जारी हैं पर संवेदना पर किसी प्रयोगशाला में कोई मुहिम नहीं जारी है।
अर्थात् न ये घुट्टी तैयार होगी,न जग संवेदनशील होगा।


बुधवार, 12 नवंबर 2014

मेरी ख्वाहिश थी कि तुम्हारी भी कोई ख्वाहिश होती,
पर तुम हो कि कहते हो,अब कोई ख्वाहिश न रही,
मुफ़लीसी के दौर होते तो शायद कुछऔर बात होती,
आज एक ख्वाहिश तुम बतलाओ तो मुझे यार सही,
मैं दौड़ते हुए दूर बाज़ार तलक जाकर ख्वाहिश खरीद लाती,
पर तुम तो कहते हो ,तुम्हीं मेरी सारी अब ख्वाहिश हो गई ।

नए समय का निर्माण

वक्त नया है,युग नया है,तकनीक नया,सबकुछ नया है,
तो तुम भी एक नए समय का अपने आस-पास  निर्माण करो।
तुम भी बदलो,कुछ शब्दों की धुंधली पड़ी हुई परिभाषा को,
परिभाषाओं को बदल अब इनका भी उत्थान करो।
नई सदी के शंखनाद का बिगुल आज हर ओर बज़ा  है,
सोंचो तुम मत इतना,बस सत्य के पथ का ध्यान करो।
आज के भले ही तुम बच्चे हो,आनेवाले कल के तुम्हीं भविष्य हो,
आने वाले इस नए स्वर्णिम भविष्य का तुम अब आह्वान करो।
सूरज तो अपने सातों घोड़े वाले रथ पर आज फ़िर से सवार  है,
प्रज्ज्वल और  तेजोमय मस्तक  से इस सूरज को भी अंतर्ध्यान करो।
तुम्हीं आज हो ,रहोगे कल भी ,देशों में और विदेशों में,
परचम हरदम देश के लहरा पाओ,बस इतना ही अरमान करो।
मात भले ही तुम एक दिन बच्चों,हिमालय की भी उँचाई को दे देना,
गाँठ बाँध लो,स्थिति चाहे जैसी आए,नैतिकता का सदैव मान करो।



शनिवार, 8 नवंबर 2014

समाचार

आज सोचा चलो! थोड़ी दिन-दुनिया की खबर लेते हैं,
टी0वी0 के सामने बैठ,रिमोट को हाथ में उठाया।
एक के बाद एक हम बीसियों चैनल बदल लेते हैं,
पर एक ने भी मुझे दिन और दुनिया का खबर नहीं दिखाया।
आप कहेंगे ! के हम ये क्या मज़ाक करतेहैं,
पर सच तो न इससे बदल भी नहीं जाएगा।
समाचार चैनल तो इनको कहा भी नहीं जाएगा।
थोड़ी देर को तो मुझे लगा कि ये सारे समाचार-चैनल,
सब्ज़ी विक्रेता की भाँति ही गुहार लगाते हैं कि,
आओ मेरी समाचार की दुकान पर आओ।
हम आपको सबसे पहले फ़लाँ समाचार दिखाते हैं,
ठीक वैसे ही जैसे सब्ज़ी-मंडी में अपनी सब्ज़ी को,
बेचने को सब दुसरों से बेहतर सब्ज़ी बताते हैं।
पर अफ़सोस कि लौटना पड़ा मुझे ईन चैनलों से भी खाली हाथ,
वैसे ही,जैसे कई बार सजी होती तो है सब्ज़ियों से ये मंडियाँ,
 हम अपने थैले पसंद की सब्ज़ी न मिलने पर खाली लेकर लौट आते हैं।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

समय की नदी के कश्ती में हूँ सवार मैं भी,
कभी तो किनारा लगायगा मुझे भी कहीं।
थोड़े-से हिचकोले भले ही खा रही हो ये कश्ती,
मंजिल पर मुझे तो पहुँचाएगा कश्ती यही।
हो सकता है कभी भँवरों से लड़ना भी पड़े,
सवार का मनोबल तो लड़खड़ाएगा भी नहीं

शनिवार, 1 नवंबर 2014

माँ!मुझे बना दो एक नन्ही-सी चिड़िया,
कहा-  माँ से एक नन्ही-सी बिटिया।
बिटिया करेगी क्या तु चिड़िया बनकर?
माँ!दूर गगन में मुझे चिड़िया बनकर,
फ़ुर्र-से उड़ते हुए दूर गगन की सैर करने जाना है।
नन्ही-सी चिड़िया बन उड़ूँ मै,माँ बना दो ना मुझे नन्ही-सी चिड़िया।
वहाँ तो मुझे कहाँ किसी से खतरा भी होगा,
ना कोई दानव और न कोई दरिंदा ही होगा।
माँ थोड़ी-सी रूँआसी होती हुई बोली-
सुन मेरी बिटिया और सुन मेरी गुड़िया।
कहाँ है?तु इस भुलावे में मेरी नन्ही-सी बिटिया,
तेरी नाजुक से पर को कतरने को मेरी चिड़िया,
वहाँ भी ताक में कुछ शिकारी बैठे होंगे,
कि कब तु अपने घोंसले से बाहर निकले,
और जाल में पकड़कर कतरे हुए परों के साथ,
भी तुझे डाल देंगे अपने पिंजरे में।
तो सुन मेरी बिटिया और सुन मेरी गुड़िया।
तु सुरक्षित है मेरी ही इस आँचल में,
मैं जीते-जी अपने इस आँचल में,
समेटे रखूँगी,तुझे अपनी नन्ही-सी चिड़िया।

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

उलझन

शब्दों के ताने-बाने बुनकर ही कविता बनती है,
इन्हीं ताने-बाने को बुनते-बुनते कुछ उलझन हो रही है।
ताने-बाने बुनकर मैं अपनी कविता लिखूँ,
या कि फ़िर पहले अपनी इस उलझन को सुलझा लूँ।
कहना यह है कि जब  कविताएँ लिखी जाती है,
तो साथ कविता के जीवन के उलझनों को पन्ने पर उतार लेते हैं।
समझ में कहाँ आता है कि कविता एक उलझन है,
या फ़िर उलझनों का नाम ही एक कविता है।

गुलाब

असली फ़ूल आज बाज़ारों में भी कहाँ मिल रहे हैं,
बस दुकानों पर खोजने में लगे हैं ऐसे फ़ूल जो,
न कभी मुरझाते हों न ही कभी सूखते हों।
गुलाब की कलियों का एक भरा-पुरा गुलदस्ता,
आज ही बाज़ार से लेकर हम आये हैं,
जिनमें लाल सुर्ख रंग है,और परफ़्युम की बोतल से,
छिड़की हुई मेरी खुश्बू से तर गुलाब में खुश्बू भी।
साथ ही साथ इन गुलाबों में चुभने वाले काँटे नहीं।
फ़ूल तो फ़ूल हैं चाहे असली हों या नकली,
बस सजने और सजाने के लिए होते हैं,
कभी बालों को तो ,कभी घर की सुंदरता ,
देख रही हूँ गुलाब को ,कभी गुलाबों से सजे अपने घर को।

रात का साया

सुना था कि सर्दियों की रातें लंबी और दिन छोटे होते हैं,
पर जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि ॠतुओं की ये परिक्रमा,
बदल से रहे हैं या शायद कुछ बदल से रहे हैं 
मेरी ही दिन और रात की ये चर्या।
जहाँ एक दिन गुज़रे तो ऐसा लगता है मानों कि बीता एक साल,
रात गुज़र जाए तो लगता है मानों अभी ही तो आई थी ये सुंदर-सी रात,
क्यों जाना चाहती है ये सुंदर-सी रात और जानें है ऐसी क्या बात,
जाकर भी छोड़ जाएगी सुंदर-सी एक छाया।
शायद दिन में तुम्हारे न होना ही रीतता का एक एहसास करवाती है,

रात में तुम्हारा साथ ही संपूर्णता का एहसास करवाती है
एक ऐसी संपूर्णता,जो संपूर्ण होकर भी आजीवन ही संपूर्ण होना चाहती है,
क्योंकि, हमेशा ही रात के साथ होगा तुम्हारा भी साया।

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

गैरत

नाफ़हमी के शिकार होते हैं कुछ लोग,जो समझते हैं,
कि गरज़मंद लोगों के गैरत भी खरीदे जा सकते हैं।
वो शायद अबतक नावाकिफ़ हैं  कि,
गैरत,कोई चीज़ नहीं जो बाज़ारों में मिला करते हैं।
आब भी आँखों में यूँ ही नहीं आया करती है,
गैरत ही आँखों में आब भी तलब करते हैं।
ऐसे आकिल होने का भी क्या फ़ायदा है,
जो गर्ज़ को भी गैरत की तराज़ू में बस तौलते हैं।
ज़नाब ये गैरत तो वो आफ़ताब है,जिसकी आतिश
तो सुपुर्दे-खाक में मिलकर भी दूर-तल्क दहकते हैं।

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

जीवन के हर कतरे में जीवन की खुशी तलाशो तो यारो!
पाओगे कि हर उस कदम पर खुशियाँ ही खुशियाँ हैं,
जहाँ से अभी-अभी तुम्हारे कदम गुज़रे हैं यारो!
खुशियों के पल थोड़े-से छोटे ज़रूर होते हैं,
पर इन छोटे पलों को भी तुम जीयो तो यारो!

जीवन का लक्ष्य

जीवन मिला है हमें लक्ष्यों का निर्धारण करने के लिए,
पर कई बार ऐसा होता है कि हम अर्जुन नहीं बन पाते हैं,
और न ही कोई मछली की आँख निर्धारित कर पाते हैं।
ज़रूरी भी नहीं कि हमारा निशाना भी अर्जुन की आँख की तरह,
सटीक और सधा हुआ हो,पर यह भी ज़रूरी नहीं कि इस डर से,
हम अपने लक्ष्यों का निर्धारण ही न करें कि क्या पता?
हमें अपना लक्ष्य मिलेगा भी कि नहीं मिलेगा कहीं,
ज़रूरी तो बस इतना है कि इस जीवन के लिए एक लक्ष्य,
पहले हम निर्धारित तो करें,लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता,
आप ही हम सधे हुए कदमों से चलकर ढूँढ ही लेंगे।


गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

सबकुछ कहते भी वही हैं,सबकुछ करते भी वही हैं,
पर देखिए उनकी मासूमियत का अंदाज़े बयाँ कि,
ज़नाब कहते हैं कि हमें तो कुछ मालूम ही नहीं है,
इसी बात पर आज तक ज़नाब के हम मरते भी तो हैं।
सुना था कि वे बावतें-रज़िश को दिल से नहीं लगाते,
पर शायद ये तो उनके बस कहने की एक बात थी।
बावते-रंजिश गर ना होती तो,वो मुझे भी मनाते,
वैसे ही जैसे कभी उनसे पहले भी बात होती थी।
आँखों में फ़्लु ,इस मर्ज़ को तो पति की आँखों में होनी ही नही चाहिए थी,
खासकर उस पत्नी से पूछिए कि उन्हीं आँखों को देखने तक की मनाही है।
जिन आँखों को देखकर मेरी सुबह और शाम होती थी,
आज उन्हीं आँखों से साहब खुद से मुझे दूर किए बैठे हैं।
हर बार बस यही जुमला सुनने को मिल रहा है,
कि तुम्हे यह फ़्लु नहीं होना चाहिए,मैं परेशान हो जाउँगा।
गर मेरी आँखों मे फ़्लु होती भी तो वो कैसे परेशान होते हैं?
शायद,यह भी जनाब का प्यार जताने का ही एक तरीका है,
तकलीफ़ मेरी शायद उन्हें देखने की आदत जो नही है,
सो अपनी आँखों मे ज़लन को मुझमें महसूस कर वे परेशान होते हैं।

रविवार, 28 सितंबर 2014

बदला हुआ मिज़ाज़

कुछ बदले-से हैं तेवर,कुछ बदला हुआ है मिज़ाज़,
या यूँ कहें कि हम ही नावाकिफ़  थे शायद उनसे ,
रहनुमा ही बताते फिरते थे इस जहाँ में उनको ,
तब कहाँ पता  था कि रहनुमा की शक्ल कैसी होती है?
आज  ही तो जाना और पहचाना है कि ये भी तो वही हैं ,
जिन्हें दुनिया कहती है कि बड़ा ही रहनुमा है यह शख्स,
अगर इसको दुनिया रहनुमाई शख्स  कहती है!
तो बेरहमों की शक्ल कैसी होती होगी ?तो मुझे देखना है उन्हीं बेरहमों को जिनके
शायद न बदले होंगे  तेवर और न बदला होगा उनका मिज़ाज़ ,
तो मुझे अब शौक है उनको देखने का जो ,
जो खुद के ऊपर बेरहमी के  इल्ज़ामों  को लेकर बेख़ौफ़  घूमते हैं .
आज की  तारीख में  रहनुमाओं ने  ही ओढ़ लिया  बेरहमों का वेश,
और इल्ज़ाम  लगे लोग ही सच्चे रहनुमा हैं शायद!
बस जानना इतना ही ज़रूरी है कि यकीन करना किनपर है?
उनपर  जो बेरहम से रहनुमा हैं ,या वे जिनपर इल्ज़ाम हैं बेरहमी के।
खुदा!तु अब कुछ ऐसे बंदे  बना जिनको देखकर ही जान जाएं ,
क्या हैं उसके तेवर और क्या है इस बंदे के  मिज़ाज़ ।


मेस वाला लड़का

सब उस पर चिल्ला रहे थे,कान तो सुनने के लिए दो ही थे न उस बेचारे के पास भी।रोहित!रोहित! सुनाई नहीं देता क्या तु्मको,एक बार में तुम सुन नहीं सकते क्या? बहरे हो गये हो क्या?ग्यारह-बारह साल तो मात्र उसकी उम्र रही होगी,उसपर एक साथ मेस के टेबल पर अगर आठ-दस लोग बैठकर ऐसे उस बेचारे पर अपनी हुक्म चलाते मानों उनके चिल्ला भर देने से महिषासुर मर्दिनी की तरह ही रोहित के भी दस हाथ निकल आएँगे और सबके हाथ में एक साथ खाने की थाली वो दे पाएगा,अगर ऐसा होत तो शायद अच्छा ही होता,कम-से-कम इनके गालियों और डाँट से तो वो बच पाता।अगर कुछ लोग उनसे ये कहते कि भई उठकर तुम खाना लेकर आ भी तो सकते हो,लेकिन नहीं,रोहित के रहते मज़ाल है कि वे हिलेंगे भी।साँवला वर्ण और दुबले-पतले  उस रोहित की आज अनायास ही याद आ गई,क्या उसके लिए भारत के किसी विद्यालय में कहीं कोई रिक्त स्थान भी नहीं,जहाँ उसे दाखिला मिल पाता और रोज़-रोज़ की डाँट-डपट से तो उसे भी निजात मिल जाती।उसकी पनियाई हुई आँखें मुझे आज भी दुःखी कर देती है।मेरी तंद्रा टूटी-मम्मी,मम्मी! भूख लगी है,खाना निकाल कर दे दो।सामने एक पल को लगा मेरा बेटा सार्थक नहीं,वही मेस वाला लड़का रोहित खड़ा था।

शनिवार, 27 सितंबर 2014

फ़लसफ़े

इतने पाठों को पढने के बाद अब भी,
लगता है कि फ़िर से कहीं किसी क्लास,
में जाकर किसी बेंच पर बैठना ही होगा,
जिस क्लास में इस जीवन की पाठ सीखायी जाती होगी।
अब भी मुझे यही लगता है कि इस जीवन ,
के कुछ पाठ में से कुछ सीखना बाकी है।
आज भी मैं ये तो कह नहीं सकती,
कि सीख लिया है,जीवन के पाठ को,
कुछ आधी-अधुरी पढी हुई है पाठ,
तो कुछ फ़लसफ़े को भूल-भी गई हूँ,
बताओ! कहाँ है इस जीवन की पाठशाला,
जीवन के फ़लसफ़े को सीखना बाकी है।

मन की व्यथा

आज किसी अपने ने कहा,कि निकाल दो लिखकर तुम अपनी सारी व्यथा,
बगैर लिखे-कहे तो मन की बातें कहीं मन के अथाह संमुदर में भी,
अथाह झंझावात मचा देगी,और यही झंझावात मन के संमुदर के,
जीवन में लहर और तुफ़ान भी मचा देते हैं,सो मेरे मन कुछ तु बता दे अपनी व्यथा,
कुछ व्यथा इस दुनिया को बता और तु खुद को जान लेने दे इस दुनिया को,
औरों की तो खूब सुनी है,अब सुनो कुछ मेरे भी अंतर्मन की एक कथा।

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

ये एक जीवन बड़ी, कहीं छोटी न पड़ जाए ,अगर इस जीवन के फ़लसफ़े को समझने के लिए,क्या बेहतर होता ,गर माँग लेती उधार में एक और जीवन,एक तो यह घड़ी है ,जो हर वक्त हर क्षण को बीतने का एहसास कराती रहती है,जबकि मैंने तो अब कमरों से घड़ी को निकाल भी दिया है,फ़िर भी ये वक्त है कि थमता ही नहीं।क्या करूँ क्या इस जहाँ में ऐसी कोई जगह नहीं ,जहाँ वक्त का पहिया भी थमता होगा।
 
अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीने का सुकून ,
अपनी बातों पर माकूल रहने का सुकून ,
वो भला क्या जानेगा,जिसके पास न तो
लगाने को कोई शर्त है,और न ही है माकूल

बेहतर है।

बेहतर है ।
माँ ! ओ माँ !
मुझे रहने दो , इसी घनी अंधेरी गुफा में
बेहतर है। यह गुफा उस रौशनी वाले जहां
बेहतर है इस अर्थ में कि उस रौशनी वाले जहां में,
मेरे लिए तो रौशनी भी ,काल ही बन जाएगी ।
उस रौशनी वाले जहां में ,आदमी भी भेड़ियों की शक्लें अख्तियार कर बेख़ौफ़ घूमते हैं .।

माँ !ओ माँ !
तेरी कोख के इस अंधेरी गुफा में
दूर तक अंधेरा ही अंधेरा है
पर फिर भी माँ !यहाँ मैं क्या दिन की रौशनी और क्या रात का अंधियारा !
मैं एकदम सुरक्षित हूँ ,उन भेड़ियों से ,जो न दिन देखते हैं और न रात देखते हैं।
बस देखते हैं तो यह कि कहाँ किस ,गली में किस सड़क पर
मिल जाए तेरी ही एक बेटी ,अस्मिता उसकी छिनने को ।
माँ!ओ माँ!
आज मैं तुझसे ही एक सवाल करती हूँ
क्या करूँगी माँ ! मैं इस रौशनी की दुनिया में आकर?
जहाँ मंदिरों में मुझे है पूजा जाता देवी बनाकर
मेरी ही आरती उतारी जाती है,दीये जलाकर
और तो और माँ !मन्नतें भी पूरी होती है,देवी को चुनर चढ़ाकर ।
पर फिर क्या माँ! इसी तेरी देवी स्वरूपा को,चुनर तो क्या माँ!
दुर्योधन और दुशासन को भी पीछे छोड़कर
हर रोज़!हर घड़ी ! किसी न किसी द्रौपदी का कहीं चीर हरण होता है।
पर माँ! क्या तुम जानती हो?उस रौशनी की दुनिया में , इस कलियुग में कोई कृष्ण भी नही,
जो तुम्हारी इस लाड़ली के लिए चीर का अंबार लगा देंगे।
माँ!ओ माँ!
अब तुम्हारी यह लाड़ली इस गुफा में भी सहम गई है।
अपने आने वाले कल को देखकर ,जहाँ शायद तेरी इस नन्ही कली को भी बख्शा नहीं जाएगा।
ये दरिन्दे ही तो घूमते हैं,भेड़ियों की शक्लों में,
जो मेरे बचपन को भी शायद रौंद ही डालेंगे।
नहीं माँ! बस मेरी इतनी ही मिन्नत है कि ,तुम अपने आँचल से भी छिपा लो और इसी अंधेरी गुफा में,
बस यहीं तुम रखो मुझे समेटकर .।
माँ! ओ माँ!
मैं आज फिर तुझसे ही एक सवाल करती हूँ
इस रौशनी की दुनिया में लाकर तुम करोगी भी क्या माँ?
जहाँ समय से पहले ही शायद तुम्हें विदा भी करना पड़े ,अपनी इस लाड़ली को सिसकते हुए ।.
तब क्या माँ!ओ माँ!
तुम भी नही रोओगी यही कहकर,कि शायद मर ही जाती मैं ,तभी तुम्हारी कोख में ,अजन्मी ही।
दरिंदों की मौत से तो शायद यही बेहतर है।
तभी तो माँ!ओ माँ!
मैं फिर अपनी यही बात कहती हूँ ,कि दुनिया के उस रौशनी से भी बेहतर है ।.
बेहतर है। तुम्हारी यही गुफा बेहतर है।
बेहतर है,इस अर्थ में कि मैं इस गुफा में,अंधेरे में किसी दरिंदे को नज़र भी कहाँ आउंगी ?
सो माँ!ओ माँ!
बेहतर है।यही तेरी अंधेरी गुफा बेहतर है ।

क्या हो रहा है यह?

क्या हो रहा है यह ?
कभी निर्भया , कभी गुड़िया
न जाने कब थमेगा , नामों का यह सिलसिला
जो कि बदस्तूर ज़ारी है ।
नाम भले ही हो किसी की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।

अभी हम निर्भया के जख्मों को ही कहाँ
हम भूल पाये थे कि गुड़िया इस नन्ही-सी गुड़िया
को मिले ज़ख्मों से निर्भया को मिले ज़ख्म भी
चिर-निद्रा में भी फिर से हरे हो गए हैं ।
ज़ख्म भले ही हो किसी निर्भया या गुड़िया की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
निर्भया तुम तो चली भी गई इस जहान से
जहाँ निर्भया होकर भी तुम्हीं ने तो झेली है
जो सदियों तक न भूल पाने वाली त्रासदी है ।
क्या फिर से तुम जन्म लेना चाहोगी ?
क्योंकि इस बार तो नन्ही-सी गुड़िया ने ही त्रासदी झेली है ।
त्रासदी भले ही हो किसी की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
कितनी भयानक है यह सदी
भयानक है इस अर्थ में कि,
जहाँ विकास के नए आयामों का
निर्धारण किया जा रहा है , पर प्रकृति की इस सुंदर रचना को
बचाने का निर्धारण अभी बाकी है ।
सुंदर रचना को अब किसी बहाने मिटाया जा रहा है
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।

आगाज़

ये रात थोड़ी लंबी ज़रूर है,पर ऐसा भी नहीं कि सवेरा नहीं होगा,
मुझे इंतज़ार है,उस सवेरे का,जहाँ सूरज अपने सुनहले रथ पर सवार होकर,
कुछ नई किरणों के साथ-साथ,लाएगा नए संदेशे,और एक नया दिन,
क्योंकि सुना है कि रविवार का दिन कुछ खास होता है ।
खास होता है इस माने भी कि इसी दिन से एक नए सप्ताह का आगाज़ होता है।

शराफ़त

बाहर के खूबसुरत से मौसम को देखकर ,
मेरे घर के गमले में लगे मनी-प्लांट की बेल,
दरीचे को खोलकर ,अपनी लचीली गर्दन को थोड़ा उचकाकर,
जबरन परदे को भी थोड़ा-सा खिसकाते हुए,
बस मेरी तरह ये भी शायद मचल रही है,,
इस मौसम की नन्ही-नन्ही बूँदों से नहाने को।
आतुर है ये भी बस चले तो मेरे घर के,
बंधन से ,मुक्त होकर भागने को,
किसी अल्हड़,किशोरवय की लड़की की भाँति,
ये भी इस बात-से शा्यद अंजान है,
कि ये मौसम इतना-भी शरीफ़ नहीं
इसी दुनिया के लोगों की तरह यह मौसम,
भी अपने मिज़ाज़ को बस पल में बदल लेगा ।

सब आज़ाद

तुम भी आज़ाद,हम भी आज़ाद
ये भी आज़ाद,वो भी आज़ाद
फ़ुल भी आज़ाद,पक्षी भी आज़ाद
बस कोई नहीं है तो वो है,यह देश
आज़ादी के मायने तो तब होंगे
जब होगी,देश की बेटियों की
बालात्कारियों से आज़ादी,
उनसे आज़ादी जो सिर्फ़ और
सिर्फ़ इस देश को लूट-खसोट रहे हैं
भ्रष्ट नेताओं और व्याभिचारियों से आज़ाद।

चैनपुर का सफ़र

आज भी बड़ी शिद्धत से आती है,मुझे अपने चैनपुर के सफ़र की याद,
जब-तब,कभी-कभी मैं अपने कल्पना के जहाज पर सवार होकर,
उसी चैनपुर गाँव में, जहाँ अभी हाल ही में सड़क का हुआ है निर्माण
पीढियाँ गुज़र गई,इस सड़क के सपने देखते-देखते,वे बेचारे मोहताज़ रहे देखने को,
बस इसी सपने को देखने में कि कब होगा अपना ये सफ़र अब आसान?
जहाँ सालों तक गर्मी की छुट्टियाँ बिताने मैं भाई-बहनों के साथ,
छुक-छुक रेलगाड़ी में बैठकर जाया करती थी,
पर रेलगाड़ी तो गया में पीछे छूट जाती थी।
वाह! क्या खूब होता था,मज़ेदार इस चैनपुर का सफ़र।
आगे हम सब होते ऐसे बस पर सवार जहाँ,
खिड़कियों को खोलने की ज़रूरत तक नहीं होती थी।
सारे खिड़कियों के शीशे पहले से ही टूटकर ,
खुली-खुली हवाओं का एहसास जो करवाती थी।
इतनी खुली खिड़कियाँ कि भगवान न करे, अगर बस को दुसरे बस ने जो एक टक्कर भी मारी,
खिड़कियों का तो कुछ बिगड़ना नहीं था,सीट तो अपनी जगह,पर बाहर होंगे सीट के सवारी।
बस यूं समझिए,कि हम किसी तरह अपने गंतव्य के,काफ़ी करीब किसी तरह पहुँच भर जाते थे।
बस का कंडक्टर रास्ते में ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ देता,सिंगापुर-सिंगापुर,हम भाई-बहन थोड़ा चकरा जाते थे।
फ़िर आपस में थोड़ी-सी जिज्ञासा बाँट लेते थे।पर कौतुहल भी बचपने के ऐसे बेकार से साथी होते थे,
जो चाह के भी पीछा कहाँ छोड़ पाते थे,फ़िर हम सब पापा के पीछे पड़ जाते थे।
पापा-पापा! क्या यही बस आगे सिंगापुर तक जाएगी?
पापा कहते हाँ,यहीं रास्ते में ही सिंगापुर बस्ती एक आएगी।
ओह!हम सभी भाई-बहन बड़े उदास उस दिन हो गए थे,
जिस दिन हमने जाना कि हम फ़िर से सिंगापुर से दूर हो गए थे,
क्योंकि मन-ही-मन विदेश का सपना जो सँजो लिए थे।
खैर सफ़र अब-भी बाकी थी,दिल में कदम-ताल का जज्बे को लिए,
हम सपरिवार एक कस्बानुमा जगह पंचानपुर में बस से नीचे उतर लिए।
हम बड़े बेबसी-से बस को देखते और लगता बस भी हो जाता और उदास
क्योंकि,शायद बस को भी हम जैसे तमीज़ वाले कुछ लोग मिल जाते थे,
वर्ना! उस नीरिह पर इंसान-से जानवर ही सवार होते थे।
यहीं तक होता था,हमाराऔर उस बस का साथ ।
अब हम भाई-बहनों के जोश-उमंग से कदम-ताल करने की आती थी बारी,
अब कदम-ताल भी तबतक ही करते,जबतक साथ देती थी समतल ज़मीन।
 जहाँ हर तरफ़ होती थी,पतली-दुबली सी , आरी ही आरी,
वर्ना!भारतीय सेना के भी मज़ाल, जो इस आरी पर कर लेते कदम-ताल।
खैर!हम चार तो भई थे,बड़े ही बहादुर,चैनपुर पहुँचने को रहते थे,बड़े ही आतुर।
लेकिन देखिए! हमें छोटे बच्चे समझकर कैसे ठगा जाता था?
जब भी,हममें से कोई पूछे,कि पापा चैनपुर कब आएगा?
पापा बड़े ही भोलेपन से हमें बुद्धु बना लेते थे,पास दिखती बस्ती को ही चैनपुर बता देते थे।
हम भी निरे बेवकूफ़ बनकर आरियों पर भी रेस लगा देते थे,
फ़िर,बस्ती के पास आते ही,पापा भी थोड़ा-सा मुस्कुरा देते थे,
और कहते,अरे बेटा! ये तो बड़ा-ही छोटा कोई  गाँव है,
गाँव कहां? कोई बिगहा है,तुमसबों का चैनपुर एक बड़ा गाँव है।
हमारी जोश को फ़िर-से पर लग जाते,चाँपाकल से मीठा,पानी पीते-पीलाते,
भई,ताड़ और खजूर के पेड़ों की गिनती,करते और करवाते,
आखिरकार इस लंबी सफ़र के बाद ,अपने गंतव्य,चैनपुर,
सही-सलामत,साबुत अवस्था में हम पहुँच ही जाते।



हम

मंगलवार, 23 सितंबर 2014


चाँदी के तार

बालों में चाँदी के तार की झलक आज आईने में देखी,
लगा कि क्या सचमुच अब बस मैं भी उस ओर चली,
जहाँ सबको एक दिन चलते हुए जाना पड़ता है।
खैर,यूँ भी उम्र कहाँ किसी के लिए रूकती है?
मैं हर रोज़ अपनी उम्र की खिड़कियों से देखती हूँ,
कि आज मेरी उम्र ने एक और दिन का सफ़र तय किया है,
और इस सफ़र पर मैं शायद वयस्कता की सड़क पर चल रही हूँ,
फ़िर इस चाँदी के इस तार से तो मुझे खुश होना है कि ,
मैंने पार कर लिया है,एक स्वर्णिम दौर,और इस दौर में,
कई ऐसे अपने को मैंने पाया है,कुछ को ही तो खोया है।
इस खोया-पाया के हिसाब में उलझने का वक्त शायद अभी नहीं आया है।
पर फ़िर-भी यौवन की दहलीज़ पार करने का थोड़ा-सा मलाल तो बाकी है।
मेरे हमजोली भी क्या अब ऐसे-ही चाँदी के तार को आईने में अब देखते होंगे?
देखते होंगे,वे भी उम्र की खिड़कियों से गुज़रते हुए अपने हर साल को।

अम्मा-बाबा की ये मुनिया


अम्मा-बाबा की ये मुनिया।

थोड़ी-सी भोली-भाली,
बहुत-थी ये निराली।
जहाँ कहीं भी ये जाती,
आ जातीं वहीं इसकी वे सारी सखियाँ।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।

खूब हँसी-ठीठोली ही,
थी,इस मुनिया की पहचान।
इस मुनिया का भी ब्याह हुआ।
उड़ चली नए घोंसले में अपनी ये चिड़िया।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।

नए सफ़र पर,नए डगर पर,
चली वो फ़िर उसी नए जोश से,
भोली मुनिया,ले गई भोलेपन की गठरी साथ,
जान नहीं पाई,कि बदल गई है ये दुनिया।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।

मुनिया!ओ मुनिया!
लगा,उसे कि उसके अंतर्मन से,
अपनी-ही आवाज़ वापस बुला रही है,
वापस-से तुम फ़िर चहकोगे,बनकर सोने-की चिड़िया।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।

सोमवार, 22 सितंबर 2014

मील का पत्थर

ऊठो!और अपने लिए एक रास्ता चुनो!
रास्ता ऐसा हो,जो पथरीला हो,
उबड़-खाबड़ हो,जो कँटीला हो।
इस रास्ते पर चलते हुए शायद तुम सुनो,
इस बदलते समय की आवाज़ को,
पथरीले और कँटीले रास्ते पर चलकर ही,
तुम स्वयं अपना एक रास्ता तैयार करोगे,
और बनोगे तुम लीक से हटकर एक,
नई लीक के निर्माता।
इस नई लीक पर चलकर ही,
तुम अपने लहुलुहान कदमों से बढोगे,
उस पथ पर  जहाँ पहुँचने वाले तुम्हीं पहले रहोगे,
और स्थापित कर दोगे एक पत्थर,
जिसे लोग मील का पत्थर कहेंगे।

तुफ़ान

हल्की-सी आहट हुई,
लगा,शायद बाहर कोई आया है!
बाहर जाकर देखा तो,
मस्त हवा के झोंके थे,
जो दरवाज़े पर दस्तक दे रहे थे।
कुछ ही देर हुए जब,
आँखों को चुभने वाले धूप-से,
परदे को खिड़की पर सरकाना पड़ा था।
पल में ही कुछ मौसम का मिज़ाज़ यूँ बदला,
मानो,ज़ोर का तुफ़ान आने वाला है।
मैं थोड़ी-सी परेशान थी,
मालूम नहीं इस बाहर चल रहे मौसम के खेल को देखकर,
या फ़िर बार-बार अपने साथ हो रहे खेल को देखकर ।
बाहर के तुफ़ान तो शायद थोड़ी-ही देर में थम जाएगा,
पर उस अंदर के तुफ़ान का क्या,जो झंझावात मचा रहा था?

समझौते

मुमकिन होता कि,ज़िंदगी कुछ और भी आसान होती,
गर कुछ समझौते,हमने भी करना सीखा होता ।
पर समझौते करना हमने अबतक तो सीखा नहीं,
कभी समझ में ही नहीं आया कि आखिर ये,
समझौते किनसे और क्योंकर करने हैं?
आसान-सी ज़िंदगी मुमकिन करने केलिए,
समझौते मेरी समझ से इतनी भी ज़रूरी नहीं होती।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

सुबह जब आँख खुली,तो देखा धूप तो कहीं दूर देश चली थी,
और बाहर रिमझिम बारिश,और काले बादलों ने अपना आसन ज़माए रखा था।
धूप तो बेचारी शायद बड़ी अकेली हो चली थी,
वर्ना इनकी कहाँ इतनी बिसात थी कि सूरज के चमक को कहीं भगा पाते।
फ़िर भी हम तो कहते हैं,कि थोड़ी देर को भले अंधियारे ने धूप को भगा रखा था,
अकेले होकर भी वह सुबह ज़रूर आएगी,जहाँ न काले बादलों का आसन होगा,
न हो पाएगा अंधियारे का इस धूप पर कहीं भी एकक्षत्र राज़,
भला कब ऐसा हुआ है कि धूप की इस चौंधियाते हुए चमक का,
ये अंधियारा सामना भी कर पाएगा?

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

वज़ह

दिल किससे खफ़ा था,कहाँ मालूम था?
मालूम था बस इतना कि ये दिल खफ़ा था।
किन बातों ने  मुझे इतना बेचैन कर रखा था?
 बात तो शायद किसी से किया ही नहीं था।
आज क्यों मै उदास थी,किसे पता था?
 उदासियों की कोई वज़ह भी तो नहीं थी।
किससे खफ़ा,किन बातों से,और आज क्यों?
फ़िर भी ये दिल उदास था ,इतना तो पता था।


देखा-कि


अचानक ही कुछ गिरने की, तेज़ आवाज़ आई,
मैं भी कुछ घबराती-सी, बाहर की ओर ही भागी।
देखा-कि करीने से रखा हुआ, फ़ुलदान गिरा पड़ा था ,
परदे की ताकत तो देखिए,जो इस फ़ुलदान पर ज़ोर दिखा रहा था।
कुछ भी समझने से पहले ,मैं भी तनिक देर भरमाई,
फ़िर जब मेरी ये छोटी-सी , नन्ही चेतना जागी।
देखा-कि ये तो पवन था,जो दरवाज़े को ताकत से धकिया रहा था,
बाहर तो काले बादलों में ,गजों-का बारात सजाया जा रहा था।
खैर,इस बारात का लुत्फ़ , देर तक न उठा पाई,
क्योंकि! तभी बाहर पड़े हुए, जूते ने भी घर में पनाह माँगी।
देखा-कि एक जोड़े जूते में,एक सूखा-एक भीगा पड़ा था,
पवन और बारात निकले दूर देश,अब बरसात अपनी तेज़ गर्जन सुना रहा था।
मौसम के नाराज़गी वाले तेवर से , मुश्किल से खुद को है बचाई,
भागकर पाया कि मैं भी थी बस, आधी सुखी-आधी भीगी।
फ़िर-भी कुछ देर बाद ,परदा-जो तनिक अब भी सरका पड़ा था,
देखा-कि मेरे गमलों में लगे नन्हे पौधों को,इत्मीनान-से नहला रहा था।

निशाँ

देखना हम जहाँ से भी गुज़रेंगे,
अपने कदमों के निशाँ छोड़ जाएँगे।
हम उनमें से  कहाँ हैं,जोआज  के आने पर,
बीते एक दिन की तरह कल हो जाएँगे।
कुछ ऐसा करते  हम चलें कि,
कुछ भी कर लेना ,पर याद हमेंशा आएँगे।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

इंतज़ार

हो सकता था।
कुछ देर और इंतज़ार के बाद,
शायद कुछ बेहतर पल आ जाते ।
हो सकता था।
पर इंतज़ार के पल इतने भी छोटे न थे कि,
बेहतर पल के इंतज़ार की भी इंतिहा हो जाती।
हो सकता था ।
कि मुझे ही उस पल से पूछना पड़ता,
कि पल तुम कब आओगे?
हो सकता था।

क्षितिज के उस पार


ले चल ! ऐ मेरे हमसफ़र।

क्षितिज़ के उस पार।

हाथों में वैसे ही हाथ थाम,

जैसे धरती का हाथ आसमान थामे चलता है।

देखना है मुझे कि क्षितिज़ के उस पार ,

धरती और आकाश की एक और क्षितिज़ ।

इस क्षितिज़ में भी क्या मेल होता है?

धरती और आकाश के बीच,

और क्या यूं धरती का  हाथ आसमान थामे चलता है?

तो ! मुझे भी जाना है क्षितिज़ के उस पार,

और वो भी सिर्फ़ तुम्हारे साथ