शब्दों के ताने-बाने बुनकर ही कविता बनती है,
इन्हीं ताने-बाने को बुनते-बुनते कुछ उलझन हो रही है।
ताने-बाने बुनकर मैं अपनी कविता लिखूँ,
या कि फ़िर पहले अपनी इस उलझन को सुलझा लूँ।
कहना यह है कि जब कविताएँ लिखी जाती है,
तो साथ कविता के जीवन के उलझनों को पन्ने पर उतार लेते हैं।
समझ में कहाँ आता है कि कविता एक उलझन है,
या फ़िर उलझनों का नाम ही एक कविता है।
इन्हीं ताने-बाने को बुनते-बुनते कुछ उलझन हो रही है।
ताने-बाने बुनकर मैं अपनी कविता लिखूँ,
या कि फ़िर पहले अपनी इस उलझन को सुलझा लूँ।
कहना यह है कि जब कविताएँ लिखी जाती है,
तो साथ कविता के जीवन के उलझनों को पन्ने पर उतार लेते हैं।
समझ में कहाँ आता है कि कविता एक उलझन है,
या फ़िर उलझनों का नाम ही एक कविता है।
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