शनिवार, 27 सितंबर 2014

मन की व्यथा

आज किसी अपने ने कहा,कि निकाल दो लिखकर तुम अपनी सारी व्यथा,
बगैर लिखे-कहे तो मन की बातें कहीं मन के अथाह संमुदर में भी,
अथाह झंझावात मचा देगी,और यही झंझावात मन के संमुदर के,
जीवन में लहर और तुफ़ान भी मचा देते हैं,सो मेरे मन कुछ तु बता दे अपनी व्यथा,
कुछ व्यथा इस दुनिया को बता और तु खुद को जान लेने दे इस दुनिया को,
औरों की तो खूब सुनी है,अब सुनो कुछ मेरे भी अंतर्मन की एक कथा।

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