रविवार, 28 सितंबर 2014

मेस वाला लड़का

सब उस पर चिल्ला रहे थे,कान तो सुनने के लिए दो ही थे न उस बेचारे के पास भी।रोहित!रोहित! सुनाई नहीं देता क्या तु्मको,एक बार में तुम सुन नहीं सकते क्या? बहरे हो गये हो क्या?ग्यारह-बारह साल तो मात्र उसकी उम्र रही होगी,उसपर एक साथ मेस के टेबल पर अगर आठ-दस लोग बैठकर ऐसे उस बेचारे पर अपनी हुक्म चलाते मानों उनके चिल्ला भर देने से महिषासुर मर्दिनी की तरह ही रोहित के भी दस हाथ निकल आएँगे और सबके हाथ में एक साथ खाने की थाली वो दे पाएगा,अगर ऐसा होत तो शायद अच्छा ही होता,कम-से-कम इनके गालियों और डाँट से तो वो बच पाता।अगर कुछ लोग उनसे ये कहते कि भई उठकर तुम खाना लेकर आ भी तो सकते हो,लेकिन नहीं,रोहित के रहते मज़ाल है कि वे हिलेंगे भी।साँवला वर्ण और दुबले-पतले  उस रोहित की आज अनायास ही याद आ गई,क्या उसके लिए भारत के किसी विद्यालय में कहीं कोई रिक्त स्थान भी नहीं,जहाँ उसे दाखिला मिल पाता और रोज़-रोज़ की डाँट-डपट से तो उसे भी निजात मिल जाती।उसकी पनियाई हुई आँखें मुझे आज भी दुःखी कर देती है।मेरी तंद्रा टूटी-मम्मी,मम्मी! भूख लगी है,खाना निकाल कर दे दो।सामने एक पल को लगा मेरा बेटा सार्थक नहीं,वही मेस वाला लड़का रोहित खड़ा था।

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