बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

एक तो इस दूरंतो रानी से दूर के सफ़र पे निकलना है, फ़िर काहे को देर-पे-देर किए जा रही है? , ऐसे ही कुछ दिल के अपनों से दूर भी तो होना है, ऐसे में ये देर और दूरी दोनों ही परेशां किए जा रही है। सबकुछ साफ़ है,दिल्ली का कोहरा दूर जा चुका है, तमाम नेता भी दिल थाम के अब बैठे हैं,दो दिनों के बाद, देखें इस दिल्ली की नए युग की आगाज़, दिल्लीवालों के दिल में कौन-सी पार्टी सही छवि अपनी बना रही है? कहीं दूर जाकर भी नज़र तो यहीं थम-सी रही है, आज इस दिल्ली में,कल दिल में दिल्ली को होना है। अंत हो इस मीलो-मील दूरी का,जो अपनों से दूरी कु्छ बढाए जा रही है, उस राह पहुँच जाएँ,हर राह जहाँ पर बसता मेरा एक अपना है।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

हर घड़ी ,समय रेत की मानिंद बंद मुट्ठियों के बावजूद भी फ़िसल रहा है,
यह फ़िसलन एक लम्हा और कम कर देती है,
जहाँ तुम और मैं बस साथ होते।
क्यों हर गुजरते हुए वक्त से एक शिकायत है,
न तुम गुजरते और न गुजर जाता तुम्हारे साथ बिताया हुआ पल,
जहाँ तुम और मैं बस साथ होते।
मेरी आवाज़ से तुम कहीं छू लेते हो उस दर्द को,
खिसकते हुए लम्हों से हुए उस बेइंतहा तकलीफ़ को,
जहाँ तुम और मैं बस साथ होते।
आज सबकुछ तो मिल जाते हैं,सिवाए समय के,
तुम मेरे लिए बस इतना करो,कुछ ऐसे समय चुरा कर ला दो,
जहाँ तुम और मैं बस साथ होते।
देखों न ! कुछ साल तो अब हमारे साथ को बीत चुके हैं,
पर बीते सालों की वो तमाम प्यार की बातें अब भी याद हैं,
जहाँ तुम और मैं बस साथ होते।
प्यार में खोए रहना और इसे महसूस करना,
लौट आओ फ़िर से उसी रूमानियत की ओर,
जहाँ तुम और मै बस एक साथ होते।
और कुछ भी मुझे अब याद भी नहीं तुम्हारे सिवा,
आओ ! और तुम भी याद करो बस उन्हीं दिनों को सिर्फ़ मेरे साथ,
जहाँ तुम और मैं बस साथ होते