गुरुवार, 18 सितंबर 2014

देखा-कि


अचानक ही कुछ गिरने की, तेज़ आवाज़ आई,
मैं भी कुछ घबराती-सी, बाहर की ओर ही भागी।
देखा-कि करीने से रखा हुआ, फ़ुलदान गिरा पड़ा था ,
परदे की ताकत तो देखिए,जो इस फ़ुलदान पर ज़ोर दिखा रहा था।
कुछ भी समझने से पहले ,मैं भी तनिक देर भरमाई,
फ़िर जब मेरी ये छोटी-सी , नन्ही चेतना जागी।
देखा-कि ये तो पवन था,जो दरवाज़े को ताकत से धकिया रहा था,
बाहर तो काले बादलों में ,गजों-का बारात सजाया जा रहा था।
खैर,इस बारात का लुत्फ़ , देर तक न उठा पाई,
क्योंकि! तभी बाहर पड़े हुए, जूते ने भी घर में पनाह माँगी।
देखा-कि एक जोड़े जूते में,एक सूखा-एक भीगा पड़ा था,
पवन और बारात निकले दूर देश,अब बरसात अपनी तेज़ गर्जन सुना रहा था।
मौसम के नाराज़गी वाले तेवर से , मुश्किल से खुद को है बचाई,
भागकर पाया कि मैं भी थी बस, आधी सुखी-आधी भीगी।
फ़िर-भी कुछ देर बाद ,परदा-जो तनिक अब भी सरका पड़ा था,
देखा-कि मेरे गमलों में लगे नन्हे पौधों को,इत्मीनान-से नहला रहा था।

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