शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

उलझन

शब्दों के ताने-बाने बुनकर ही कविता बनती है,
इन्हीं ताने-बाने को बुनते-बुनते कुछ उलझन हो रही है।
ताने-बाने बुनकर मैं अपनी कविता लिखूँ,
या कि फ़िर पहले अपनी इस उलझन को सुलझा लूँ।
कहना यह है कि जब  कविताएँ लिखी जाती है,
तो साथ कविता के जीवन के उलझनों को पन्ने पर उतार लेते हैं।
समझ में कहाँ आता है कि कविता एक उलझन है,
या फ़िर उलझनों का नाम ही एक कविता है।

गुलाब

असली फ़ूल आज बाज़ारों में भी कहाँ मिल रहे हैं,
बस दुकानों पर खोजने में लगे हैं ऐसे फ़ूल जो,
न कभी मुरझाते हों न ही कभी सूखते हों।
गुलाब की कलियों का एक भरा-पुरा गुलदस्ता,
आज ही बाज़ार से लेकर हम आये हैं,
जिनमें लाल सुर्ख रंग है,और परफ़्युम की बोतल से,
छिड़की हुई मेरी खुश्बू से तर गुलाब में खुश्बू भी।
साथ ही साथ इन गुलाबों में चुभने वाले काँटे नहीं।
फ़ूल तो फ़ूल हैं चाहे असली हों या नकली,
बस सजने और सजाने के लिए होते हैं,
कभी बालों को तो ,कभी घर की सुंदरता ,
देख रही हूँ गुलाब को ,कभी गुलाबों से सजे अपने घर को।

रात का साया

सुना था कि सर्दियों की रातें लंबी और दिन छोटे होते हैं,
पर जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि ॠतुओं की ये परिक्रमा,
बदल से रहे हैं या शायद कुछ बदल से रहे हैं 
मेरी ही दिन और रात की ये चर्या।
जहाँ एक दिन गुज़रे तो ऐसा लगता है मानों कि बीता एक साल,
रात गुज़र जाए तो लगता है मानों अभी ही तो आई थी ये सुंदर-सी रात,
क्यों जाना चाहती है ये सुंदर-सी रात और जानें है ऐसी क्या बात,
जाकर भी छोड़ जाएगी सुंदर-सी एक छाया।
शायद दिन में तुम्हारे न होना ही रीतता का एक एहसास करवाती है,

रात में तुम्हारा साथ ही संपूर्णता का एहसास करवाती है
एक ऐसी संपूर्णता,जो संपूर्ण होकर भी आजीवन ही संपूर्ण होना चाहती है,
क्योंकि, हमेशा ही रात के साथ होगा तुम्हारा भी साया।

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

गैरत

नाफ़हमी के शिकार होते हैं कुछ लोग,जो समझते हैं,
कि गरज़मंद लोगों के गैरत भी खरीदे जा सकते हैं।
वो शायद अबतक नावाकिफ़ हैं  कि,
गैरत,कोई चीज़ नहीं जो बाज़ारों में मिला करते हैं।
आब भी आँखों में यूँ ही नहीं आया करती है,
गैरत ही आँखों में आब भी तलब करते हैं।
ऐसे आकिल होने का भी क्या फ़ायदा है,
जो गर्ज़ को भी गैरत की तराज़ू में बस तौलते हैं।
ज़नाब ये गैरत तो वो आफ़ताब है,जिसकी आतिश
तो सुपुर्दे-खाक में मिलकर भी दूर-तल्क दहकते हैं।

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

जीवन के हर कतरे में जीवन की खुशी तलाशो तो यारो!
पाओगे कि हर उस कदम पर खुशियाँ ही खुशियाँ हैं,
जहाँ से अभी-अभी तुम्हारे कदम गुज़रे हैं यारो!
खुशियों के पल थोड़े-से छोटे ज़रूर होते हैं,
पर इन छोटे पलों को भी तुम जीयो तो यारो!

जीवन का लक्ष्य

जीवन मिला है हमें लक्ष्यों का निर्धारण करने के लिए,
पर कई बार ऐसा होता है कि हम अर्जुन नहीं बन पाते हैं,
और न ही कोई मछली की आँख निर्धारित कर पाते हैं।
ज़रूरी भी नहीं कि हमारा निशाना भी अर्जुन की आँख की तरह,
सटीक और सधा हुआ हो,पर यह भी ज़रूरी नहीं कि इस डर से,
हम अपने लक्ष्यों का निर्धारण ही न करें कि क्या पता?
हमें अपना लक्ष्य मिलेगा भी कि नहीं मिलेगा कहीं,
ज़रूरी तो बस इतना है कि इस जीवन के लिए एक लक्ष्य,
पहले हम निर्धारित तो करें,लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता,
आप ही हम सधे हुए कदमों से चलकर ढूँढ ही लेंगे।


गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

सबकुछ कहते भी वही हैं,सबकुछ करते भी वही हैं,
पर देखिए उनकी मासूमियत का अंदाज़े बयाँ कि,
ज़नाब कहते हैं कि हमें तो कुछ मालूम ही नहीं है,
इसी बात पर आज तक ज़नाब के हम मरते भी तो हैं।
सुना था कि वे बावतें-रज़िश को दिल से नहीं लगाते,
पर शायद ये तो उनके बस कहने की एक बात थी।
बावते-रंजिश गर ना होती तो,वो मुझे भी मनाते,
वैसे ही जैसे कभी उनसे पहले भी बात होती थी।
आँखों में फ़्लु ,इस मर्ज़ को तो पति की आँखों में होनी ही नही चाहिए थी,
खासकर उस पत्नी से पूछिए कि उन्हीं आँखों को देखने तक की मनाही है।
जिन आँखों को देखकर मेरी सुबह और शाम होती थी,
आज उन्हीं आँखों से साहब खुद से मुझे दूर किए बैठे हैं।
हर बार बस यही जुमला सुनने को मिल रहा है,
कि तुम्हे यह फ़्लु नहीं होना चाहिए,मैं परेशान हो जाउँगा।
गर मेरी आँखों मे फ़्लु होती भी तो वो कैसे परेशान होते हैं?
शायद,यह भी जनाब का प्यार जताने का ही एक तरीका है,
तकलीफ़ मेरी शायद उन्हें देखने की आदत जो नही है,
सो अपनी आँखों मे ज़लन को मुझमें महसूस कर वे परेशान होते हैं।