शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

क्षितिज के उस पार


ले चल ! ऐ मेरे हमसफ़र।

क्षितिज़ के उस पार।

हाथों में वैसे ही हाथ थाम,

जैसे धरती का हाथ आसमान थामे चलता है।

देखना है मुझे कि क्षितिज़ के उस पार ,

धरती और आकाश की एक और क्षितिज़ ।

इस क्षितिज़ में भी क्या मेल होता है?

धरती और आकाश के बीच,

और क्या यूं धरती का  हाथ आसमान थामे चलता है?

तो ! मुझे भी जाना है क्षितिज़ के उस पार,

और वो भी सिर्फ़ तुम्हारे साथ


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