मेरी ख्वाहिश थी कि तुम्हारी भी कोई ख्वाहिश होती,
पर तुम हो कि कहते हो,अब कोई ख्वाहिश न रही,
मुफ़लीसी के दौर होते तो शायद कुछऔर बात होती,
आज एक ख्वाहिश तुम बतलाओ तो मुझे यार सही,
मैं दौड़ते हुए दूर बाज़ार तलक जाकर ख्वाहिश खरीद लाती,
पर तुम तो कहते हो ,तुम्हीं मेरी सारी अब ख्वाहिश हो गई ।
पर तुम हो कि कहते हो,अब कोई ख्वाहिश न रही,
मुफ़लीसी के दौर होते तो शायद कुछऔर बात होती,
आज एक ख्वाहिश तुम बतलाओ तो मुझे यार सही,
मैं दौड़ते हुए दूर बाज़ार तलक जाकर ख्वाहिश खरीद लाती,
पर तुम तो कहते हो ,तुम्हीं मेरी सारी अब ख्वाहिश हो गई ।
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