क्या हो रहा है यह ?
कभी निर्भया , कभी गुड़िया
न जाने कब थमेगा , नामों का यह सिलसिला
जो कि बदस्तूर ज़ारी है ।
नाम भले ही हो किसी की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
कभी निर्भया , कभी गुड़िया
न जाने कब थमेगा , नामों का यह सिलसिला
जो कि बदस्तूर ज़ारी है ।
नाम भले ही हो किसी की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
अभी हम निर्भया के जख्मों को ही कहाँ
हम भूल पाये थे कि गुड़िया इस नन्ही-सी गुड़िया
को मिले ज़ख्मों से निर्भया को मिले ज़ख्म भी
चिर-निद्रा में भी फिर से हरे हो गए हैं ।
ज़ख्म भले ही हो किसी निर्भया या गुड़िया की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
निर्भया तुम तो चली भी गई इस जहान से
जहाँ निर्भया होकर भी तुम्हीं ने तो झेली है
जो सदियों तक न भूल पाने वाली त्रासदी है ।
क्या फिर से तुम जन्म लेना चाहोगी ?
क्योंकि इस बार तो नन्ही-सी गुड़िया ने ही त्रासदी झेली है ।
त्रासदी भले ही हो किसी की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
कितनी भयानक है यह सदी
भयानक है इस अर्थ में कि,
जहाँ विकास के नए आयामों का
निर्धारण किया जा रहा है , पर प्रकृति की इस सुंदर रचना को
बचाने का निर्धारण अभी बाकी है ।
सुंदर रचना को अब किसी बहाने मिटाया जा रहा है
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
हम भूल पाये थे कि गुड़िया इस नन्ही-सी गुड़िया
को मिले ज़ख्मों से निर्भया को मिले ज़ख्म भी
चिर-निद्रा में भी फिर से हरे हो गए हैं ।
ज़ख्म भले ही हो किसी निर्भया या गुड़िया की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
निर्भया तुम तो चली भी गई इस जहान से
जहाँ निर्भया होकर भी तुम्हीं ने तो झेली है
जो सदियों तक न भूल पाने वाली त्रासदी है ।
क्या फिर से तुम जन्म लेना चाहोगी ?
क्योंकि इस बार तो नन्ही-सी गुड़िया ने ही त्रासदी झेली है ।
त्रासदी भले ही हो किसी की
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
कितनी भयानक है यह सदी
भयानक है इस अर्थ में कि,
जहाँ विकास के नए आयामों का
निर्धारण किया जा रहा है , पर प्रकृति की इस सुंदर रचना को
बचाने का निर्धारण अभी बाकी है ।
सुंदर रचना को अब किसी बहाने मिटाया जा रहा है
पर हर बार वह मैं ही हूँ ।
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