अम्मा-बाबा की ये मुनिया।
थोड़ी-सी भोली-भाली,
बहुत-थी ये निराली।
जहाँ कहीं भी ये जाती,
आ जातीं वहीं इसकी वे सारी सखियाँ।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।
खूब हँसी-ठीठोली ही,
थी,इस मुनिया की पहचान।
इस मुनिया का भी ब्याह हुआ।
उड़ चली नए घोंसले में अपनी ये चिड़िया।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।
नए सफ़र पर,नए डगर पर,
चली वो फ़िर उसी नए जोश से,
भोली मुनिया,ले गई भोलेपन की गठरी साथ,
जान नहीं पाई,कि बदल गई है ये दुनिया।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।
मुनिया!ओ मुनिया!
लगा,उसे कि उसके अंतर्मन से,
अपनी-ही आवाज़ वापस बुला रही है,
वापस-से तुम फ़िर चहकोगे,बनकर सोने-की चिड़िया।
अम्मा-बाबा की ये मुनिया।
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