मुझे भी कु्छ कहना है
शुक्रवार, 12 सितंबर 2014
इंतज़ार
हो सकता था।
कुछ देर और इंतज़ार के बाद,
शायद कुछ बेहतर पल आ जाते ।
हो सकता था।
पर इंतज़ार के पल इतने भी छोटे न थे कि,
बेहतर पल के इंतज़ार की भी इंतिहा हो जाती।
हो सकता था ।
कि मुझे ही उस पल से पूछना पड़ता,
कि पल तुम कब आओगे?
हो सकता था।
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