सोमवार, 22 सितंबर 2014

तुफ़ान

हल्की-सी आहट हुई,
लगा,शायद बाहर कोई आया है!
बाहर जाकर देखा तो,
मस्त हवा के झोंके थे,
जो दरवाज़े पर दस्तक दे रहे थे।
कुछ ही देर हुए जब,
आँखों को चुभने वाले धूप-से,
परदे को खिड़की पर सरकाना पड़ा था।
पल में ही कुछ मौसम का मिज़ाज़ यूँ बदला,
मानो,ज़ोर का तुफ़ान आने वाला है।
मैं थोड़ी-सी परेशान थी,
मालूम नहीं इस बाहर चल रहे मौसम के खेल को देखकर,
या फ़िर बार-बार अपने साथ हो रहे खेल को देखकर ।
बाहर के तुफ़ान तो शायद थोड़ी-ही देर में थम जाएगा,
पर उस अंदर के तुफ़ान का क्या,जो झंझावात मचा रहा था?

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