रविवार, 3 मई 2015
आज के समय में बुद्ध के अधम्म की बदली हुई प्रासंगिकता -
बुद्ध तुमने जो भी कहा कि यह अधम्म है,आज के समय में सबने उन्हीं को फ़िर-से धम्म मान ग्रहण कर लिया है।तुम्हे तो एक वैशाख पूर्णिमा का दिन मिला भी,जिससे तुम्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और तुम तथागत हो गए।पर आज क्या कोई ऐसा पीपलवृक्ष नहीं जहाँ बैठकर ज्ञान की प्राप्ति उनको होती जो तुम्हारे बताए सारे अधम्म को ही धम्म बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं।देखो न!तुमने कहा था कि परा-प्रकृति में विश्वास करना अधम्म है,पर आज तो परा-प्रकृति को ही विश्वास करने पर ज़ोर दिया जा रहा है,चमत्कारों का बोलबाला है,रंग-बिरंगे पत्थरों और मणकों से सजी दुकान प्रतीत होती है, कुछ हथेलियाँ भी,भूत-प्रेत,डायन और पिशाच सब दिखाते हैं समाचारों पर,कुछ ऐसे भगवान भी आज पृथ्वी पर अवतरित हो गए हैं,जो सिर्फ़ नरबलि से ही प्रसन्न होते हैं,डायन बताकर भीड़ खदेड़कर कई बार मार भी डालती है उस स्त्री को ,जिसका पेट सुना है कि किसी भोजन से नहीं भरता है,और वह अपना पेट भी गाँव के लोगों को खाकर भरती है।तुम्ही ने कहा था कि आत्मा में विश्वास करना भी अधम्म है,पर देखो न! आज तो पुनर्जन्म भी लेने को आतुर है,कई भटकती हुई आत्माएँ,आत्मा की शांति के लिए कितने ही प्रपंच रचे जाते हैं। फ़िर बुद्ध तुमने तो कहा था कि कल्पना-आधारित विश्वास को मानना भी एक अधम्म ही है! पर देखो !आज तो कल्पना-आधारित विश्वास की ऐसी अंधड़ है कि कई मीडिया के माध्यमों से डराया जाता है,अप्रत्यक्ष में धमकाया जाता है कि फ़ोटो मात्र को शेयर न करने पर कुछ विनाश होगा मेरा,कभी दस लोगों को संदेश भेजने के लिए प्रेरित किया जाता है,क्या करूँ बुद्ध कुछ तो सुझाओ,कुछ राह बताओ। एक और बात को तुमने अपने बोध के अनुसार अधम्म माना था जो था, धर्म की पुस्तकों का वाचन मात्र,पर बुद्ध देखो यहाँ भी हज़ारों हज़ार की कई धार्मिक पुस्तकें उपलब्ध हैं और क्या गलत,क्या सही बस आँखें मूँदे हुए सबकुछ रटने को तो नहीं कहा था कि जीवन में इसका मर्म समझे बगैर ही सिर्फ़ इनके उपर चलते हुए उन्मादी हो जाना।और इन किताबों में वर्णित ईश्वरीय रूप का महिमामंडन करने के लिए कितने ही धारावाहिकों का निर्माण हो रहा है,जो इस भक्ति की दरबार के लिए प्रेरित करता जान पड़ता है, आज वो सबकुछ हो रहा है,बुद्ध जिस तुमने कभी माना था कि यह अधम्म है।कहीं दरबार लगाकर बैठे हुए हैं ऐसे बाबा जो देखकर ही सारी तकलीफ़ जान-समझ कर उसके उटपटांग कुछ निदान भी बता देते हैं,एक बाबा अभी जेल में बलात्कार के सजायाफ़्ता हैं,पर उनकी गवाही देनेवाले लोग लगभग मारे जा चुके हैं।प्रात:काल से ही प्रवचन आरंभ हो जाते हैं,टीवी पर ग्लैमरस बाबा और सजी-धजी कुछ महिला बाबा भी भविष्यवाणी करते हुए दिख जाते हैं,बहुत सारे उपाय भी बताते हैं,गऊ को बचाने की बुद्ध आज एक युद्ध स्तर पर मुहिम चलाई जा रही है,पर अजन्मी कन्याएँ मारी जा रही है,बलात्कार की शिकार हो रही हैं,देश में बेमौसम की बरसात को भी इश्वरीय प्रकोप कहकर डराया जा रहा है,तुम्हारी तो कबसे नौवें अवतार में मदिरों में स्थापना भी हो चुकी है,तुम पर फ़ूल चढ़ाया जा रहा है,अगरबत्ती से तुम्हें खुश किया जा रहा है,पर बुद्ध तुम फ़िर भी नहीं मुस्कुरा रहे हो ।शायद इस धरती के इन कर्मकांड ने तुम्हें और गंभीर बना दिया है,और तुम आज फ़िर-से दु:खी हो,ठीक उसी दिन के समान ,जब तुम जर्जर काया और मृत व्यक्ति के शव को देखकर हुए थे।बुद्ध तुम आज सचमुच होते,तो एक बार फ़िर-से परिनिर्वाण हेतु कुशीनगर चले जाते दु:खी होकर इस संसार से।तुम्हारे बताए अधम्म तो कब के अप्रासंगिक हो चुके हैं,सभी को धम्म की मान्यता मिल गई है,फ़िर मैं कैसे पूछूँ तुमसे, कि बुद्ध तुम मुस्कुराते क्यों नहीं?
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