आज यहाँ आकर ऐसा लगा मानों ये अंजानों की अंजुमन थी,
या शायद इस अंजुमन में आकर सब एक-दुसरे से अंजान बने थे।
ये तो कुछ ऐसी बात हो गई कि हमें कुछ अपनों की तलाश थी,
पर जो अपने भी यहाँ थे वे भी कुछ ना पहचानने का ढोंग किए थे।
शायद उनकी भी कुछ अपनी ही मज़बुरियाँ ही रही थी,
जो उन्हें पहचान तक नहीं रहे थे,उनके तसव्वुर में ऐसे डूबे थे।
और पहचानने वालों को तस्लीम करने की फ़ुर्सत उन्हें कहाँ थी,
चित ही चित में तसव्वुर करके भी सुर्ख गालों पर तबस्सुम बिखरे थे।
या शायद इस अंजुमन में आकर सब एक-दुसरे से अंजान बने थे।
ये तो कुछ ऐसी बात हो गई कि हमें कुछ अपनों की तलाश थी,
पर जो अपने भी यहाँ थे वे भी कुछ ना पहचानने का ढोंग किए थे।
शायद उनकी भी कुछ अपनी ही मज़बुरियाँ ही रही थी,
जो उन्हें पहचान तक नहीं रहे थे,उनके तसव्वुर में ऐसे डूबे थे।
और पहचानने वालों को तस्लीम करने की फ़ुर्सत उन्हें कहाँ थी,
चित ही चित में तसव्वुर करके भी सुर्ख गालों पर तबस्सुम बिखरे थे।
bahut khoob
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