मंगलवार, 25 नवंबर 2014

क्या किसी दुकान पर संवेदनशीलता बिकती है?
अगर बिकती तो मैं ज़रूर खरीद लेती।
खरीद लेती और इस संवेदनशीलता को,
देती मैं किसी प्रयोशाला में,
और इतना ज़रूर कह देती कि ,
कुछ रसायनों से इस संवेदनशीलता की अभिक्रिया कराकर,
वैज्ञानिक तुम एक संवेदना की घुट्टी तैयार करो।
तैयार करो इस घुट्टी को बाँट देती मैं इस संवेदनशून्य जगत को।
और  शायद इस घुट्टी का कुछ असर ऐसा होता,
कि जहाँ दया,संवेदना जैसे विलुप्त भाव की वज़ह से
जग में संवेदनशून्यता का बोलबाला है,
इस घुट्टी से यह जग और जग के मानव,
फ़िर से संवेदनशील हो जाते।

मानव संवेदनशील बन जाता तब जब यह दुकान पर कहीं बिकती।
यह दुकानों पर न तो  बिकती है और संवेदना न खरीदी जा सकती।
तो क्या यह संवेदनशीलता इस 21वीं सदी में भी मात्र स्वप्न  बन कर रह जाएगी?
जहाँ इस सदी के विकसित देशों की प्रयोगशालाओं में आज तो क्लोन और स्टेम-सेल
पर भी काम करके मानव बीमारियों से बचाने की मुहिम जारी है।
सच है,सारे मुहिम जारी हैं पर संवेदना पर किसी प्रयोगशाला में कोई मुहिम नहीं जारी है।
अर्थात् न ये घुट्टी तैयार होगी,न जग संवेदनशील होगा।


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