जीवन मिला है हमें लक्ष्यों का निर्धारण करने के लिए,
पर कई बार ऐसा होता है कि हम अर्जुन नहीं बन पाते हैं,
और न ही कोई मछली की आँख निर्धारित कर पाते हैं।
ज़रूरी भी नहीं कि हमारा निशाना भी अर्जुन की आँख की तरह,
सटीक और सधा हुआ हो,पर यह भी ज़रूरी नहीं कि इस डर से,
हम अपने लक्ष्यों का निर्धारण ही न करें कि क्या पता?
हमें अपना लक्ष्य मिलेगा भी कि नहीं मिलेगा कहीं,
ज़रूरी तो बस इतना है कि इस जीवन के लिए एक लक्ष्य,
पहले हम निर्धारित तो करें,लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता,
आप ही हम सधे हुए कदमों से चलकर ढूँढ ही लेंगे।
पर कई बार ऐसा होता है कि हम अर्जुन नहीं बन पाते हैं,
और न ही कोई मछली की आँख निर्धारित कर पाते हैं।
ज़रूरी भी नहीं कि हमारा निशाना भी अर्जुन की आँख की तरह,
सटीक और सधा हुआ हो,पर यह भी ज़रूरी नहीं कि इस डर से,
हम अपने लक्ष्यों का निर्धारण ही न करें कि क्या पता?
हमें अपना लक्ष्य मिलेगा भी कि नहीं मिलेगा कहीं,
ज़रूरी तो बस इतना है कि इस जीवन के लिए एक लक्ष्य,
पहले हम निर्धारित तो करें,लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता,
आप ही हम सधे हुए कदमों से चलकर ढूँढ ही लेंगे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें