सुना था कि सर्दियों की रातें लंबी और दिन छोटे होते हैं,
पर जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि ॠतुओं की ये परिक्रमा,
बदल से रहे हैं या शायद कुछ बदल से रहे हैं
मेरी ही दिन और रात की ये चर्या।
जहाँ एक दिन गुज़रे तो ऐसा लगता है मानों कि बीता एक साल,
रात गुज़र जाए तो लगता है मानों अभी ही तो आई थी ये सुंदर-सी रात,
क्यों जाना चाहती है ये सुंदर-सी रात और जानें है ऐसी क्या बात,
जाकर भी छोड़ जाएगी सुंदर-सी एक छाया।
शायद दिन में तुम्हारे न होना ही रीतता का एक एहसास करवाती है,
रात में तुम्हारा साथ ही संपूर्णता का एहसास करवाती है
एक ऐसी संपूर्णता,जो संपूर्ण होकर भी आजीवन ही संपूर्ण होना चाहती है,
क्योंकि, हमेशा ही रात के साथ होगा तुम्हारा भी साया।
पर जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि ॠतुओं की ये परिक्रमा,
बदल से रहे हैं या शायद कुछ बदल से रहे हैं
मेरी ही दिन और रात की ये चर्या।
जहाँ एक दिन गुज़रे तो ऐसा लगता है मानों कि बीता एक साल,
रात गुज़र जाए तो लगता है मानों अभी ही तो आई थी ये सुंदर-सी रात,
क्यों जाना चाहती है ये सुंदर-सी रात और जानें है ऐसी क्या बात,
जाकर भी छोड़ जाएगी सुंदर-सी एक छाया।
शायद दिन में तुम्हारे न होना ही रीतता का एक एहसास करवाती है,
रात में तुम्हारा साथ ही संपूर्णता का एहसास करवाती है
एक ऐसी संपूर्णता,जो संपूर्ण होकर भी आजीवन ही संपूर्ण होना चाहती है,
क्योंकि, हमेशा ही रात के साथ होगा तुम्हारा भी साया।
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