सोमवार, 2 मार्च 2015

वही एक बोनसाई

क्योंकि मैं भी हूँ वही एक बोनसाई। जिसके जड़ों को समय रहते काट दिया जाता है। ताकि मैं घरों की चारदीवारी में ही कैद हो सकूँ, खुली हवाओं में मेरी खुशबू दूर-दूर तक न फ़ैल सके, मेरे सौन्दर्य को घूरती आँखों से भी तो बचाना है, और घर के सौन्दर्य को काफ़ी होगा घर के कोने में ही कहीं सजाना । वो भले ही कभी हो मेरे पिता का घर या फ़िर मेरे पति का घर। क्योंकि मैं भी हूँ वही एक बोनसाई। जिसके जड़ों को समय रहते काट दिया जाता है। ताकि मैं फ़िर से दफ़्तरों के किसी एक कोने में सिर्फ़ प्रदर्शित हो सकूँ, खुली प्रकृति में कहीं लोग दूर-दूर तक मुझे न जान सके, मेरी आकाश छूने की इस आकांक्षा को भी रोकना है, और मेरी पहचान के लिए तो काफ़ी होगा दफ़्तर का सिर्फ़ एक कोना । वो भले ही कभी हो मेरा कोई घर या फ़िर मेरा कोई-सा भी दफ़्तर। क्योंकि मैं भी हूँ वही एक बोनसाई। जिसके जड़ों को समय रहते काट दिया जाता है। ताकि मैं ऊपर बढ़ सकने के हौसले को कैसे भी रोक सकूँ, खुले जहाँ में मेरी शोहरत दूर-दूर तक न पहुँच सके, मेरी उड़ान को समय रहते ही कैसे भी कतरना है, और मेरी आवाज को दबाने के लिए काफ़ी होगा किसी फ़ाईल का एक पन्ना। वो भले ही कभी हो मेरा ही कोई दोस्त या फ़िर मेरा कोई-एक अफ़सर।

कलिया बहू

आज सारी उसकी यादें आँखों के सामने तिर आयी। बचपन से उसे मैंने काली बहू के रूप में ही जाना था,नाम उसका शायद ही गाँव में किसी को पता था। उसकी पहचान समूचे गाँव में ही कलिया बहू के रूप में थी।यह भी मुझे बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि काली उसके पहले पति का नाम था,जिसके मर जाने के पश्चात उसने दुसरी शादी शमन से कर ली थी। पर उसकी पहचान उसे उसके मरे हुए पति के नाम से ही मिली हुई थी । चाहे गाँव के बच्चे उससे उम्र में कितने भी छोटे थे, पर क्या छोटा और क्या बड़ा, सब उसे कलिया बहू के नाम से ही पुकारते थे। अपने पति के बिगड़े नाम से पुकारने पर भी उसे तनिक गुरेज़ न होता था,शायद यह हमारे सामंती समाज का असर था जहाँ उसे यह तनिक भी अटपटा नहीँ लगता था।किसी भी काम को चाहे जो , उससे करवा लेते थे, उम्र उसकी तकरीबन रही होगी,पैंतालिस से उपर। भीमकाय शरीर था उसका,शरीर पर दुसरों के घरों से जो उतरन साड़ी मिल जाती थी,वही लिपटी रहती थी।रंग भी काला था,नाक कुछ बड़ी,आँखें बाहर की ओर निकली हुई। हम सभी भाई-बहन अक्सर छुट्टियों में गाँव गर्मी की एक से डेढ महीने की छुट्टियाँ बिताकर ही लौटते थे।इन्हीँ छुट्टियों के दौरान काली बहू से हमारी मुलाकात होती थी,क्योंकि वो हमारे घर की ही मज़ूरनी अर्थात् घर में होने वाले कामों को करने आया करती थी। हमारे लिए कुएँ से पानी भरने हम जैसे ही उसे कहते-वह कहती ‘लाब न जी’ ! कै बाल्टी से नहैब अर्थात् कितना बाल्टी से मुझे नहाना है,और उसके हाथ न थकते थे,कुएँ से बाल्टी के बाल्टी पानी भरते हुए,मस्तमौला अंदाज़ में वह बाल्टी पर बाल्टी भरती ही जाती।आज सोचती हूँ तो ऐसा प्रतीत है मानों हम भी तो उसके लिए मात्र शोषक ही थे। वापस तो हम समय के पहिए को घुमा नहीं सकते,पर ज़ेहन में आज भी उसकी यादें ज्यों के त्यों घूमते रहते हैं। पर आज उसकी याद आने की जो वज़ह थी,माँ का आज मेरे घर पर आना। माँ के आने के बाद जैसा कि हर बेटी के साथ होता है,घर-बाहर,दुनिया-जहान की वो तमाम बातें माँ-बेटी एक साथ बैठकर कर लेते हैं,जिनसे आज के व्यस्त लोगों को शायद कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ने वाला। पर मैं एक-एक कर माँ से पूछती जा रही थी,फ़लाँ की क्या खबर है? फ़लाँ के बेटे का विवाह कहाँ और कितने में तय हुआ? इसी बातचीत के सिलसिले में कब हमारी बातचीत हमारे गाँव पहुँच गई ,पता ही नहीं चला। शायद बातों का दौर कुछ ऐसा ही होता है। जब माँ से मैंने पूछा-कि माँ कालीबहू अब कैसी है,वो तो अब बहुत बूढी हो गई हो गई होगी,अब तो उससे बेचारी-से शायद ही कोई काम हो पाता होगा? तभी माँ ने आश्चर्य-मिश्रित भाव से पूछा-क्यों ! तुम्हें क्या नहीं पता है कि उसे मरे हुए भी साल से उपर हो गया है? नहीं मुझे कहाँ पता है,माँ। क्या हुआ था उसे माँ,मैं थोड़ी-सी भावुक हो चली थी? फ़िर माँ ने ही बताया कि उसे हैज़ा हो गया था,तीन-चार दिन तक उसके जर्जर शरीर ने मौत से लड़ा भी लेकिन कबतक वो बूढा शरीर आखिर उसका साथ देता,सो वह चल बसी। मैंने पुन: आकुल होते हुए पूछा-क्या उसका ईलाज नहीं करवाया गया था माँ,हैज़े में भी समय पर अगर मरीज को डा0 मिल जाते हैं तो सही ईलाज मिल जाने पर मरीज बच जाता है।कहाँ ! बेटा तुम भी ऐसी बात करती हो कि जैसे तुम्हें कुछ पता ही नहीं,एक समय के बाद बुढापे की वज़ह से जिन घरों में आजीवन अपनी सेवा दी थी,उन्हीं घरों के दरवाज़े उसके लिए तो बंद हो गए थे,वज़ह तो साफ़ थी कि अब उस बेचारी के थके हुए शरीर ने काम करने से जवाब दे दिया था। हमसबों का भी गाँव जाना बहुत ही कम हो चला था,सो कुछ ही घर और रहे थे जहाँ उसकी सेवा की अब ज़रूरत थी। तभी मुझे याद आया कि माँ उसकी दो बेटियाँ भी तो थी,माँ ने फ़िर बताया कि नहीं छोटी बेटी तो बहुत पहले ही अपनी ही बस्ती के शादीशुदा मर्द के साथ भाग गई थी,कुछ अता-पता भी नहीं कि कहाँ और किस हाल में है? और दुसरी,वो भी तो अपने पति के साथ मज़दूरी करती थी न? हाँ उसका नाम रजनी था और उसके पति का नाम-यदुनंदन। माँ से ही जाना फ़िर कि नहीं शायद वे भी बेचारे इतनी क्षमता नहीं रखते थे कि वे भी कलिया बहू का ईलाज करा पाते। ओह तो शायद गरीबी नाम की बेबसी से कलिया बहू की मौत हुई है,हैज़े से नहीं। फ़िर माँ से ही मन को झकझोरने वाली एक और बात का पता चला-कि कलिया बहू की मौत के बाद उसके क्रियाकर्म करने के बजाए,उसे उसी साड़ी में जिसमें शायद वह चारपाई पर दम तोड़ी होगी,उसी तरह बगैर किसी कफ़न के नदी जो हमेशा ही सूखी रहती है ,उसके रेत में कलिया बहू के मृत काया को दफ़ना दिया ,रजनी और उसके पति यदुनंदन ने । दुसरे दिन कुछ गाँव के ही बड़े-बुजुर्ग ने इस बात पर बहुत हील-हुज्जत किया, कि बिना किसी क्रियाकर्म के किसी को दफ़ना देने से आत्मा की शांति नहीं होती। मैं अब यह सोचने को मज़बूर थी कि तब ये लोग कहाँ थे जब ये आजीवन अपनी सेवा देने वाली स्त्री ईलाज़ के लिए मोहताज़ थी,अब मृत कलिया बहू की आत्मा से इतना मोह है या कि शायद ये उसके भूत से डर रहे हैं कि कहीं रात की घोर अंधेरे में कलिया बहू का भूत फ़िर से इनसे पूछ कर कि ‘लाब न पनिया भर दियो” इनके नींद में कहीं खलल न डाल दे।