गुरुवार, 25 सितंबर 2014

बेहतर है।

बेहतर है ।
माँ ! ओ माँ !
मुझे रहने दो , इसी घनी अंधेरी गुफा में
बेहतर है। यह गुफा उस रौशनी वाले जहां
बेहतर है इस अर्थ में कि उस रौशनी वाले जहां में,
मेरे लिए तो रौशनी भी ,काल ही बन जाएगी ।
उस रौशनी वाले जहां में ,आदमी भी भेड़ियों की शक्लें अख्तियार कर बेख़ौफ़ घूमते हैं .।

माँ !ओ माँ !
तेरी कोख के इस अंधेरी गुफा में
दूर तक अंधेरा ही अंधेरा है
पर फिर भी माँ !यहाँ मैं क्या दिन की रौशनी और क्या रात का अंधियारा !
मैं एकदम सुरक्षित हूँ ,उन भेड़ियों से ,जो न दिन देखते हैं और न रात देखते हैं।
बस देखते हैं तो यह कि कहाँ किस ,गली में किस सड़क पर
मिल जाए तेरी ही एक बेटी ,अस्मिता उसकी छिनने को ।
माँ!ओ माँ!
आज मैं तुझसे ही एक सवाल करती हूँ
क्या करूँगी माँ ! मैं इस रौशनी की दुनिया में आकर?
जहाँ मंदिरों में मुझे है पूजा जाता देवी बनाकर
मेरी ही आरती उतारी जाती है,दीये जलाकर
और तो और माँ !मन्नतें भी पूरी होती है,देवी को चुनर चढ़ाकर ।
पर फिर क्या माँ! इसी तेरी देवी स्वरूपा को,चुनर तो क्या माँ!
दुर्योधन और दुशासन को भी पीछे छोड़कर
हर रोज़!हर घड़ी ! किसी न किसी द्रौपदी का कहीं चीर हरण होता है।
पर माँ! क्या तुम जानती हो?उस रौशनी की दुनिया में , इस कलियुग में कोई कृष्ण भी नही,
जो तुम्हारी इस लाड़ली के लिए चीर का अंबार लगा देंगे।
माँ!ओ माँ!
अब तुम्हारी यह लाड़ली इस गुफा में भी सहम गई है।
अपने आने वाले कल को देखकर ,जहाँ शायद तेरी इस नन्ही कली को भी बख्शा नहीं जाएगा।
ये दरिन्दे ही तो घूमते हैं,भेड़ियों की शक्लों में,
जो मेरे बचपन को भी शायद रौंद ही डालेंगे।
नहीं माँ! बस मेरी इतनी ही मिन्नत है कि ,तुम अपने आँचल से भी छिपा लो और इसी अंधेरी गुफा में,
बस यहीं तुम रखो मुझे समेटकर .।
माँ! ओ माँ!
मैं आज फिर तुझसे ही एक सवाल करती हूँ
इस रौशनी की दुनिया में लाकर तुम करोगी भी क्या माँ?
जहाँ समय से पहले ही शायद तुम्हें विदा भी करना पड़े ,अपनी इस लाड़ली को सिसकते हुए ।.
तब क्या माँ!ओ माँ!
तुम भी नही रोओगी यही कहकर,कि शायद मर ही जाती मैं ,तभी तुम्हारी कोख में ,अजन्मी ही।
दरिंदों की मौत से तो शायद यही बेहतर है।
तभी तो माँ!ओ माँ!
मैं फिर अपनी यही बात कहती हूँ ,कि दुनिया के उस रौशनी से भी बेहतर है ।.
बेहतर है। तुम्हारी यही गुफा बेहतर है।
बेहतर है,इस अर्थ में कि मैं इस गुफा में,अंधेरे में किसी दरिंदे को नज़र भी कहाँ आउंगी ?
सो माँ!ओ माँ!
बेहतर है।यही तेरी अंधेरी गुफा बेहतर है ।

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