इतने पाठों को पढने के बाद अब भी,
लगता है कि फ़िर से कहीं किसी क्लास,
में जाकर किसी बेंच पर बैठना ही होगा,
जिस क्लास में इस जीवन की पाठ सीखायी जाती होगी।
अब भी मुझे यही लगता है कि इस जीवन ,
के कुछ पाठ में से कुछ सीखना बाकी है।
आज भी मैं ये तो कह नहीं सकती,
कि सीख लिया है,जीवन के पाठ को,
कुछ आधी-अधुरी पढी हुई है पाठ,
तो कुछ फ़लसफ़े को भूल-भी गई हूँ,
बताओ! कहाँ है इस जीवन की पाठशाला,
जीवन के फ़लसफ़े को सीखना बाकी है।
लगता है कि फ़िर से कहीं किसी क्लास,
में जाकर किसी बेंच पर बैठना ही होगा,
जिस क्लास में इस जीवन की पाठ सीखायी जाती होगी।
अब भी मुझे यही लगता है कि इस जीवन ,
के कुछ पाठ में से कुछ सीखना बाकी है।
आज भी मैं ये तो कह नहीं सकती,
कि सीख लिया है,जीवन के पाठ को,
कुछ आधी-अधुरी पढी हुई है पाठ,
तो कुछ फ़लसफ़े को भूल-भी गई हूँ,
बताओ! कहाँ है इस जीवन की पाठशाला,
जीवन के फ़लसफ़े को सीखना बाकी है।
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