मंगलवार, 23 सितंबर 2014

चाँदी के तार

बालों में चाँदी के तार की झलक आज आईने में देखी,
लगा कि क्या सचमुच अब बस मैं भी उस ओर चली,
जहाँ सबको एक दिन चलते हुए जाना पड़ता है।
खैर,यूँ भी उम्र कहाँ किसी के लिए रूकती है?
मैं हर रोज़ अपनी उम्र की खिड़कियों से देखती हूँ,
कि आज मेरी उम्र ने एक और दिन का सफ़र तय किया है,
और इस सफ़र पर मैं शायद वयस्कता की सड़क पर चल रही हूँ,
फ़िर इस चाँदी के इस तार से तो मुझे खुश होना है कि ,
मैंने पार कर लिया है,एक स्वर्णिम दौर,और इस दौर में,
कई ऐसे अपने को मैंने पाया है,कुछ को ही तो खोया है।
इस खोया-पाया के हिसाब में उलझने का वक्त शायद अभी नहीं आया है।
पर फ़िर-भी यौवन की दहलीज़ पार करने का थोड़ा-सा मलाल तो बाकी है।
मेरे हमजोली भी क्या अब ऐसे-ही चाँदी के तार को आईने में अब देखते होंगे?
देखते होंगे,वे भी उम्र की खिड़कियों से गुज़रते हुए अपने हर साल को।

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