सुबह जब आँख खुली,तो देखा धूप तो कहीं दूर देश चली थी,
और बाहर रिमझिम बारिश,और काले बादलों ने अपना आसन ज़माए रखा था।
धूप तो बेचारी शायद बड़ी अकेली हो चली थी,
वर्ना इनकी कहाँ इतनी बिसात थी कि सूरज के चमक को कहीं भगा पाते।
फ़िर भी हम तो कहते हैं,कि थोड़ी देर को भले अंधियारे ने धूप को भगा रखा था,
अकेले होकर भी वह सुबह ज़रूर आएगी,जहाँ न काले बादलों का आसन होगा,
न हो पाएगा अंधियारे का इस धूप पर कहीं भी एकक्षत्र राज़,
भला कब ऐसा हुआ है कि धूप की इस चौंधियाते हुए चमक का,
ये अंधियारा सामना भी कर पाएगा?
और बाहर रिमझिम बारिश,और काले बादलों ने अपना आसन ज़माए रखा था।
धूप तो बेचारी शायद बड़ी अकेली हो चली थी,
वर्ना इनकी कहाँ इतनी बिसात थी कि सूरज के चमक को कहीं भगा पाते।
फ़िर भी हम तो कहते हैं,कि थोड़ी देर को भले अंधियारे ने धूप को भगा रखा था,
अकेले होकर भी वह सुबह ज़रूर आएगी,जहाँ न काले बादलों का आसन होगा,
न हो पाएगा अंधियारे का इस धूप पर कहीं भी एकक्षत्र राज़,
भला कब ऐसा हुआ है कि धूप की इस चौंधियाते हुए चमक का,
ये अंधियारा सामना भी कर पाएगा?
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