आज भी बड़ी शिद्धत से आती है,मुझे अपने चैनपुर के सफ़र की याद,
जब-तब,कभी-कभी मैं अपने कल्पना के जहाज पर सवार होकर,
उसी चैनपुर गाँव में, जहाँ अभी हाल ही में सड़क का हुआ है निर्माण
पीढियाँ गुज़र गई,इस सड़क के सपने देखते-देखते,वे बेचारे मोहताज़ रहे देखने को,
बस इसी सपने को देखने में कि कब होगा अपना ये सफ़र अब आसान?
जहाँ सालों तक गर्मी की छुट्टियाँ बिताने मैं भाई-बहनों के साथ,
छुक-छुक रेलगाड़ी में बैठकर जाया करती थी,
पर रेलगाड़ी तो गया में पीछे छूट जाती थी।
वाह! क्या खूब होता था,मज़ेदार इस चैनपुर का सफ़र।
आगे हम सब होते ऐसे बस पर सवार जहाँ,
खिड़कियों को खोलने की ज़रूरत तक नहीं होती थी।
सारे खिड़कियों के शीशे पहले से ही टूटकर ,
खुली-खुली हवाओं का एहसास जो करवाती थी।
इतनी खुली खिड़कियाँ कि भगवान न करे, अगर बस को दुसरे बस ने जो एक टक्कर भी मारी,
खिड़कियों का तो कुछ बिगड़ना नहीं था,सीट तो अपनी जगह,पर बाहर होंगे सीट के सवारी।
बस यूं समझिए,कि हम किसी तरह अपने गंतव्य के,काफ़ी करीब किसी तरह पहुँच भर जाते थे।
बस का कंडक्टर रास्ते में ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ देता,सिंगापुर-सिंगापुर,हम भाई-बहन थोड़ा चकरा जाते थे।
फ़िर आपस में थोड़ी-सी जिज्ञासा बाँट लेते थे।पर कौतुहल भी बचपने के ऐसे बेकार से साथी होते थे,
जो चाह के भी पीछा कहाँ छोड़ पाते थे,फ़िर हम सब पापा के पीछे पड़ जाते थे।
पापा-पापा! क्या यही बस आगे सिंगापुर तक जाएगी?
पापा कहते हाँ,यहीं रास्ते में ही सिंगापुर बस्ती एक आएगी।
ओह!हम सभी भाई-बहन बड़े उदास उस दिन हो गए थे,
जिस दिन हमने जाना कि हम फ़िर से सिंगापुर से दूर हो गए थे,
क्योंकि मन-ही-मन विदेश का सपना जो सँजो लिए थे।
खैर सफ़र अब-भी बाकी थी,दिल में कदम-ताल का जज्बे को लिए,
हम सपरिवार एक कस्बानुमा जगह पंचानपुर में बस से नीचे उतर लिए।
हम बड़े बेबसी-से बस को देखते और लगता बस भी हो जाता और उदास
क्योंकि,शायद बस को भी हम जैसे तमीज़ वाले कुछ लोग मिल जाते थे,
वर्ना! उस नीरिह पर इंसान-से जानवर ही सवार होते थे।
यहीं तक होता था,हमाराऔर उस बस का साथ ।
अब हम भाई-बहनों के जोश-उमंग से कदम-ताल करने की आती थी बारी,
अब कदम-ताल भी तबतक ही करते,जबतक साथ देती थी समतल ज़मीन।
जहाँ हर तरफ़ होती थी,पतली-दुबली सी , आरी ही आरी,
वर्ना!भारतीय सेना के भी मज़ाल, जो इस आरी पर कर लेते कदम-ताल।
खैर!हम चार तो भई थे,बड़े ही बहादुर,चैनपुर पहुँचने को रहते थे,बड़े ही आतुर।
लेकिन देखिए! हमें छोटे बच्चे समझकर कैसे ठगा जाता था?
जब भी,हममें से कोई पूछे,कि पापा चैनपुर कब आएगा?
पापा बड़े ही भोलेपन से हमें बुद्धु बना लेते थे,पास दिखती बस्ती को ही चैनपुर बता देते थे।
हम भी निरे बेवकूफ़ बनकर आरियों पर भी रेस लगा देते थे,
फ़िर,बस्ती के पास आते ही,पापा भी थोड़ा-सा मुस्कुरा देते थे,
और कहते,अरे बेटा! ये तो बड़ा-ही छोटा कोई गाँव है,
गाँव कहां? कोई बिगहा है,तुमसबों का चैनपुर एक बड़ा गाँव है।
हमारी जोश को फ़िर-से पर लग जाते,चाँपाकल से मीठा,पानी पीते-पीलाते,
भई,ताड़ और खजूर के पेड़ों की गिनती,करते और करवाते,
आखिरकार इस लंबी सफ़र के बाद ,अपने गंतव्य,चैनपुर,
सही-सलामत,साबुत अवस्था में हम पहुँच ही जाते।
हम
जब-तब,कभी-कभी मैं अपने कल्पना के जहाज पर सवार होकर,
उसी चैनपुर गाँव में, जहाँ अभी हाल ही में सड़क का हुआ है निर्माण
पीढियाँ गुज़र गई,इस सड़क के सपने देखते-देखते,वे बेचारे मोहताज़ रहे देखने को,
बस इसी सपने को देखने में कि कब होगा अपना ये सफ़र अब आसान?
जहाँ सालों तक गर्मी की छुट्टियाँ बिताने मैं भाई-बहनों के साथ,
छुक-छुक रेलगाड़ी में बैठकर जाया करती थी,
पर रेलगाड़ी तो गया में पीछे छूट जाती थी।
वाह! क्या खूब होता था,मज़ेदार इस चैनपुर का सफ़र।
आगे हम सब होते ऐसे बस पर सवार जहाँ,
खिड़कियों को खोलने की ज़रूरत तक नहीं होती थी।
सारे खिड़कियों के शीशे पहले से ही टूटकर ,
खुली-खुली हवाओं का एहसास जो करवाती थी।
इतनी खुली खिड़कियाँ कि भगवान न करे, अगर बस को दुसरे बस ने जो एक टक्कर भी मारी,
खिड़कियों का तो कुछ बिगड़ना नहीं था,सीट तो अपनी जगह,पर बाहर होंगे सीट के सवारी।
बस यूं समझिए,कि हम किसी तरह अपने गंतव्य के,काफ़ी करीब किसी तरह पहुँच भर जाते थे।
बस का कंडक्टर रास्ते में ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ देता,सिंगापुर-सिंगापुर,हम भाई-बहन थोड़ा चकरा जाते थे।
फ़िर आपस में थोड़ी-सी जिज्ञासा बाँट लेते थे।पर कौतुहल भी बचपने के ऐसे बेकार से साथी होते थे,
जो चाह के भी पीछा कहाँ छोड़ पाते थे,फ़िर हम सब पापा के पीछे पड़ जाते थे।
पापा-पापा! क्या यही बस आगे सिंगापुर तक जाएगी?
पापा कहते हाँ,यहीं रास्ते में ही सिंगापुर बस्ती एक आएगी।
ओह!हम सभी भाई-बहन बड़े उदास उस दिन हो गए थे,
जिस दिन हमने जाना कि हम फ़िर से सिंगापुर से दूर हो गए थे,
क्योंकि मन-ही-मन विदेश का सपना जो सँजो लिए थे।
खैर सफ़र अब-भी बाकी थी,दिल में कदम-ताल का जज्बे को लिए,
हम सपरिवार एक कस्बानुमा जगह पंचानपुर में बस से नीचे उतर लिए।
हम बड़े बेबसी-से बस को देखते और लगता बस भी हो जाता और उदास
क्योंकि,शायद बस को भी हम जैसे तमीज़ वाले कुछ लोग मिल जाते थे,
वर्ना! उस नीरिह पर इंसान-से जानवर ही सवार होते थे।
यहीं तक होता था,हमाराऔर उस बस का साथ ।
अब हम भाई-बहनों के जोश-उमंग से कदम-ताल करने की आती थी बारी,
अब कदम-ताल भी तबतक ही करते,जबतक साथ देती थी समतल ज़मीन।
जहाँ हर तरफ़ होती थी,पतली-दुबली सी , आरी ही आरी,
वर्ना!भारतीय सेना के भी मज़ाल, जो इस आरी पर कर लेते कदम-ताल।
खैर!हम चार तो भई थे,बड़े ही बहादुर,चैनपुर पहुँचने को रहते थे,बड़े ही आतुर।
लेकिन देखिए! हमें छोटे बच्चे समझकर कैसे ठगा जाता था?
जब भी,हममें से कोई पूछे,कि पापा चैनपुर कब आएगा?
पापा बड़े ही भोलेपन से हमें बुद्धु बना लेते थे,पास दिखती बस्ती को ही चैनपुर बता देते थे।
हम भी निरे बेवकूफ़ बनकर आरियों पर भी रेस लगा देते थे,
फ़िर,बस्ती के पास आते ही,पापा भी थोड़ा-सा मुस्कुरा देते थे,
और कहते,अरे बेटा! ये तो बड़ा-ही छोटा कोई गाँव है,
गाँव कहां? कोई बिगहा है,तुमसबों का चैनपुर एक बड़ा गाँव है।
हमारी जोश को फ़िर-से पर लग जाते,चाँपाकल से मीठा,पानी पीते-पीलाते,
भई,ताड़ और खजूर के पेड़ों की गिनती,करते और करवाते,
आखिरकार इस लंबी सफ़र के बाद ,अपने गंतव्य,चैनपुर,
सही-सलामत,साबुत अवस्था में हम पहुँच ही जाते।
हम
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