सोमवार, 2 मार्च 2015

वही एक बोनसाई

क्योंकि मैं भी हूँ वही एक बोनसाई। जिसके जड़ों को समय रहते काट दिया जाता है। ताकि मैं घरों की चारदीवारी में ही कैद हो सकूँ, खुली हवाओं में मेरी खुशबू दूर-दूर तक न फ़ैल सके, मेरे सौन्दर्य को घूरती आँखों से भी तो बचाना है, और घर के सौन्दर्य को काफ़ी होगा घर के कोने में ही कहीं सजाना । वो भले ही कभी हो मेरे पिता का घर या फ़िर मेरे पति का घर। क्योंकि मैं भी हूँ वही एक बोनसाई। जिसके जड़ों को समय रहते काट दिया जाता है। ताकि मैं फ़िर से दफ़्तरों के किसी एक कोने में सिर्फ़ प्रदर्शित हो सकूँ, खुली प्रकृति में कहीं लोग दूर-दूर तक मुझे न जान सके, मेरी आकाश छूने की इस आकांक्षा को भी रोकना है, और मेरी पहचान के लिए तो काफ़ी होगा दफ़्तर का सिर्फ़ एक कोना । वो भले ही कभी हो मेरा कोई घर या फ़िर मेरा कोई-सा भी दफ़्तर। क्योंकि मैं भी हूँ वही एक बोनसाई। जिसके जड़ों को समय रहते काट दिया जाता है। ताकि मैं ऊपर बढ़ सकने के हौसले को कैसे भी रोक सकूँ, खुले जहाँ में मेरी शोहरत दूर-दूर तक न पहुँच सके, मेरी उड़ान को समय रहते ही कैसे भी कतरना है, और मेरी आवाज को दबाने के लिए काफ़ी होगा किसी फ़ाईल का एक पन्ना। वो भले ही कभी हो मेरा ही कोई दोस्त या फ़िर मेरा कोई-एक अफ़सर।

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